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Wednesday, October 8, 2014

इस दीपावली कुछ नया करते है पटाके की जगह गरीब बच्चो को उनकी पढाई और बेहतर जिंदिगी के लिए मदद करे !!!

चार साल पहले देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ। सरकार ने स्कूलों की हालत के मद्देनजर इस
कानून को लागू करने के लिए तीन साल का वक्त दिया। लेकिन तीन साल के बाद भी महज 7 फीसदी स्कूल ही शिक्षा के अधिकार कानून के मानकों पर खरे उतर रहे हैं। शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है। देशभर में 6 साल से 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के बड़े बड़े दावों के बीच 1 अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो गया है।
इस कानून को लागू करने से पहले स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और दूसरी कमियों को सुधारने के लिए राज्यों को 3 साल का वक्त दिया गया था। लेकिन 1 अप्रैल 2013 को डेडलाइन खत्म होने के बाद भी ज्यादातर स्कूलों की हालत में कोई सुधार नहीं है।
खुद सरकार मानती है कि इस कानून को लागू करने में सरकार फेल हो चुकी है। शिक्षा का अधिकार कानून को लागू करने के लिए राज्य और समय मांग रहे हैं। बेशक सरकार ये दावा करे कि स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ गई है लेकिन गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर में महज 7 फीसदी स्कूल ही शिक्षा के अधिकार कानून के मापदंड पर खरे उतरते हैं। आरटीई फोरम के निदेशक ने कहा कि राज्य सरकारें पूरी तहर से फेल हैं।
शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने के लिए सरकार की गंभीरता उसके खुद के आंकड़ों में भी साफ झलक रही है। देशभर में प्राइमरी स्कूलों में 40 फीसदी शिक्षकों की कमी है। 33 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए टॉयलेट तक नहीं है। 39 फीसदी स्कूलों में शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। देश भर में 11 लाख शिक्षकों की कमी है। वहीं 8 लाख से भी ज्यादा शिक्षकों को तो ट्रेनिंग की जरूरत है।
शिक्षा के कानून में बुनियादी सुविधाओं की बात की गई है। कानून में कहा गया है कि कोई भी स्कूल किसी भी आधार पर 6 साल से लेकर 14 साल तक के बच्चों को दाखिला देने से इंकार नहीं कर सकता। किसी भी क्लास में दाखिले के लिए बच्चों का टेस्ट नहीं लिया जा सकता।
शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को स्कूल में दाखिला देने से मना नहीं किया जा सकता। स्कूल की इमारत शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों के अनुसार होनी चाहिए। स्कूलों में शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए खास ट्रेंड टीचर्स होने चाहिए। प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए 25 फीसदी कोटा जरूरी है। स्कूलों में साफ पीने का पानी और टॉयलेट की सुविधा होनी जरूरी है। बच्चों के बैठने के लिए क्लास में बेंच होनी जरूरी है। प्राइमरी क्लास में हर 30 बच्चों पर 1 टीचर होना जरूरी है। इसके साथ ही शिक्षकों को ट्रेनिंग की भी जरूरत है।
यही नहीं सरकार को हर इलाके में बच्चों के मुताबिक स्कूलों की जरूरत के लिए देशभर में सर्वे करना था। लेकिन ये भी नहीं हुआ। यहां तक कि ये कानून अमल में आए या नहीं इस पर नजर रखने वाली मॉनिटरिंग बॉडी भी अब तक कागजों पर ही है।
दोस्तों इस दीपावली कुछ नया करते है पटाके की जगह गरीब बच्चो को उनकी पढाई और बेहतर जिंदिगी के लिए मदद करे धन्यवाद !!!

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